“अब्दुल गफूर इंसानियत के प्रतीक थे, उन्होंने शराफ़त और खुद्दारी की मिसाल कायम की” – डॉ. अहमद अशफाक करीम

रिपोर्ट मोहम्मद आसिफ अता
पटना/हाजीपुर(वैशाली)
पूर्व मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर की 21वीं पुण्यतिथि पर “अब्दुल गफूर मेमोरियल फाउंडेशन” द्वारा आयोजित श्रद्धांजलि समारोह में बिहार की प्रमुख हस्तियों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।समारोह की अध्यक्षता करते हुए फाउंडेशन के संरक्षक एवं राज्यसभा के पूर्व सांसद, डॉ. अहमद अशफाक करीम (चांसलर – अल करीम यूनिवर्सिटी, संस्थापक निदेशक – कटिहार मेडिकल कॉलेज) ने कहा कि “जब 1970 के दशक में जेपी आंदोलन के चलते बिहार में राजनीतिक अस्थिरता थी और देश में आपातकाल जैसा माहौल था, ऐसे कठिन समय में अब्दुल गफूर का मुख्यमंत्री बनना एक ऐतिहासिक घटना थी। उन्होंने दो साल तक अपने पद को ईमानदारी और समझदारी से निभाया।”
डॉ. करीम ने कहा कि अब्दुल गफूर शिक्षा के माध्यम से समाज को उन्नत बनाना चाहते थे। उन्होंने ईमानदारी और खुद्दारी की जो मिसाल पेश की, वह आज के नेताओं के लिए प्रेरणा है। उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी अल्पसंख्यकों की शिक्षा और रोजगार के लिए ऐतिहासिक कार्य किए हैं, जिनमें अल्पसंख्यक छात्रावासों और संस्थानों की स्थापना शामिल है।डॉ. करीम ने अफसोस ज़ाहिर किया कि जब 2004 में अब्दुल गफूर का निधन हुआ, तब बिहार में तथाकथित “सेक्युलर” सरकार थी, लेकिन उनके जनाज़े में सरकार का कोई प्रतिनिधि शामिल नहीं हुआ। उन्होंने मांग की कि अब्दुल गफूर की जयंती और पुण्यतिथि को भी सरकारी स्तर पर मनाया जाए, जैसे कर्पूरी ठाकुर और अन्य नेताओं की मनाई जाती है।अन्य वक्ताओं ने भी गफूर साहब को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा – मोहम्मद रफ़ी (फाउंडेशन के सचिव और कौमी असातिजह तंजीम के राज्य संयोजक) ने कहा कि गफूर साहब ने दिखा दिया कि अगर मुसलमान सही दिशा में प्रयास करें, तो मुख्यमंत्री की कुर्सी तक भी पहुँचा जा सकता है।एस.एम. अशरफ फरीद (कौमी तंजीम के संपादक व कौमी असातिजह तंजीम के संरक्षक) ने उनके सादगीपूर्ण जीवन और ईमानदारी को याद करते हुए बताया कि गफूर साहब ने पद छोड़ने के बाद सरकारी सुविधाएं लेने से इंकार कर दिया और रिक्शा से घर लौटे।इज़हार आलम (पूर्व विधायक) ने डॉ. अशफाक करीम को “बिहार का सर सैयद” बताते हुए उनकी प्रशंसा की कि वे गफूर साहब की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।अब्दुस्सलाम अंसारी (डिप्टी डायरेक्टर, सेकेंडरी एजुकेशन) ने कहा कि गफूर साहब को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब हम उनके बताए रास्ते पर चलें और शिक्षा को प्राथमिकता दें।डॉ. अनवारुल हुदा ने अपने पिता की गफूर साहब से दोस्ती और उनके अखबार को दिए गए सहयोग को याद किया।मौलाना शिब्ली क़ासमी और अशरफ नबी क़ैसर ने फाउंडेशन के गठन और उनकी स्मृति को जीवंत बनाए रखने के प्रयासों की सराहना की।इस अवसर पर कई अन्य लोग भी उपस्थित थे, जिनमें शामिल थ।क़ाज़ी नकीब एकता (कोषाध्यक्ष), ताजुल आरिफ़ीन (राष्ट्रीय अध्यक्ष, शिक्षक संगठन), मोहम्मद ताजुद्दीन, नसीम अख्तर, अज़ीमुद्दीन अंसारी, अबरार आलम (छपरा संयोजक),मोहम्मद रब्बानी (सीतामढ़ी संयोजक), रफी अहमद (गोपलगंज), मोहम्मद अली ज़फ़र (मीडिया इंचार्ज), मोहम्मद शाहंशाह उर्फ़ अब्दुल्ला, ज़ाकिर अली अंसारी, हाफ़िज़ रिजवान, इरफ़ान अहमद, रज़ी अहमद फै़ज़ी, राशिद अहमद, शब्बान, इनामुल हक़, मुखिया फारूक़ आज़म, तहसीन नदीम, मोहम्मद इस्माइल, आसिफ़ नसीम, ललन मांझी और ओम प्रकाश आदि।कार्यक्रम का शुभारंभ कारी अनवार द्वारा कुरआन की तिलावत और दीप प्रज्ज्वलन से हुआ।अध्यक्षता डॉ.अशफाक करीम और संचालन मोहम्मद रफ़ी ने किया। समापन पर क़ाज़ी नकीब एकता ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।विशेष सम्मान:
इस अवसर पर पूर्व बीपीएससी अध्यक्ष इम्तियाज़ अहमद करीमी को “अब्दुल गफूर पुरस्कार” से नवाज़ा गया। उन्होंने अपने संबोधन में शिक्षा को सफलता की कुंजी बताया और कहा कि क़ुरआन का पहला संदेश “इक़रा” ही हमें ज्ञान प्राप्त करने का आदेश देता है।

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